योगी का सुपरहिट फॉर्मूला, जिसमें न लाठी चली, न गोली, पर दंगाइयों को जख्म बहुत गहरे मिले

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लखनऊ। जिस वक्त दंगाई दिल्ली को जला रहे थे, उस वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कैमरे के सामने दहाड़ रहे थे कि किसी में हिम्मत हो तो उत्तर प्रदेश में बवाल करके देखे। दिल्ली कई दिन जलती रही, पर उत्तर प्रदेश में उपद्रवी घरों में दुबके रहे। वजह थी, योगी का वह सुपरहिट फॉर्मूला, जिसमें न लाठी चली, न गोली, पर दंगाइयों को जख्म बहुत गहरे मिले।

दरअसल दिल्ली से पहले लखनऊ में भी एक दिन जमकर उपद्रव हुआ था। दंगाइयों ने दिन भर खूब हिंसा, लूटपाट और आगजनी की थी। महिलाओं-बच्चों की ढाल के चलते पुलिस कुछ कर नहीं पाई। खैर, योगी जी ने नया रास्ता निकाला। वीडियो और फोटो से दंगाइयों की पहचान करवाई और शहर भर में इनकी तस्वीरों के होर्डिंग लगवा दिए।

उपद्रवी की तस्वीरों के होर्डिंग लगे हुए : सरकारी अमले ने नुकसान का आकलन किया और वसूली के नोटिस इनके घरों पर चस्पा करवा दिए। कोर्ट में मुकदमे दर्ज हो गए। इस कार्रवाई से दंगाइयों की हवा निकल गई। नाते-रिश्तेदार और घनिष्ठ-मित्र कन्नी काटने लगे। जो लोग इन्हें कैश-बिरयानी का लालच देकर लाए थे, वे दिल्ली, अलीगढ़ खिसक लिए। यह उपद्रवी भाग भी नहीं सकते, क्योंकि हर जगह उनकी तस्वीरों के होर्डिंग लगे हुए हैं।

कोर्ट ने संपत्तियों के नुकसान की भरपाई के लिए जुर्माना लगाना शुरू कर दिया है। इनके मां-बाप इन्हें अलग से ताने दे रहे कि इनकी वजह से परिवार की इज्जत और सुकून चला गया। बेचारे दंगाई कटी पतंग की तरह इधर-उधर भटक रहे हैं। सब उस घड़ी को कोस रहे, जब उन्होंने अलीगढ़ और जामिया के बहादुरों के उकसाने पर अपने शहर में आग लगाई थी। उनकी लगाई आग तो बुझ गई, पर उसकी तपिश अब इनकी अपनी जिंदगी को झुलसा रही है।

टांग में गोली : योगी जी का फॉर्मूला सिर्फ दंगाइयों के लिए ही सुपरहिट नहीं है, अपराधी भी इससे थर-थर कांपते हैं। उनकी सरकार बनते ही खास वर्गों के अपराधियों ने योजनाबद्ध ढंग से ऊधम काटना शुरू किया तो पुलिस ने बड़ी संख्या में हिस्ट्रीशीटर और इनामी अपराधी ढेर किए। वोटबैंक राजनीति के लिए कुख्यात एक पार्टी के अपरिपक्व नेताजी के पेट में इस पर कुछ ज्यादा ही मरोड़ होने लगी। वह पुलिस की कार्रवाई को एक खास संप्रदाय के खिलाफ अभियान बताकर मोटे-मोटे आंसू बहाने लगे। इस पर ज्यादा शोर मचता, इससे पहले पुलिस ने अपनी रणनीति बदल ली। अब अपराधी ढेर तो नहीं हो रहे, पर पुलिस मुठभेड़ में पैर के निचले हिस्से में गोली खाने के बाद घायल अवस्था में दबोचे जा रहे हैं। पुलिस अधिकारी स्वीकारते हैं कि यह फॉर्मूला भी कारगर साबित हो रहा है। पैर में गोली खाने के डर से अपराधी यूपी छोड़ बंगाल, मध्य प्रदेश और राजस्थान में शरण ले रहे हैं। इससे यूपी में कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रित हो रहे हैं।

रस्सी जल गई, पर… : आजम खां कई दिन इधर-उधर भागते रहे, पर जब रामपुर का साम्राज्य कुर्क होने की नौबत आ गई तो पत्नी और बेटे को लेकर न्यायालय की चौखट पर आना ही पड़ा। पता था कि जेल जाना पड़ेगा, इसलिए उनके कारिंदे बड़े-बड़े संदूकनुमा कई बैग लेकर जेल के गेट पर आ डटे। जेल का गेट पार करते हुए आजम अपने पैरों की थरथराहट काबू करने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने एक बार पीछे मुड़कर होठों पर फर्जी मुस्कुराहट जुटाई और हवा में हाथ हिलाया, पर यह देखकर मायूस हुए कि सामने उनके वेतनभोगी कारिंदों के अलावा कोई नहीं था। जहाज डूबने लगता है तो चूहे बाहर कूद जाते हैं। आजम के जहाज में पानी भरता देखकर चूहे पहले ही कूद चुके थे।

आजम को जल्द समझ में आ गया : बहरहाल रामपुर जेल प्रशासन पर आजम का रुतबा बाकी था। वहां उनकी भरपूर आवभगत हुई। शाम होते-होते यह सूचना लखनऊ पहुंच गई और तय किया गया कि आजम को भोर होते ही सीतापुर शिफ्ट कर दिया जाए। सीतापुर जेल में दाखिल होने पर महाशय को पहली बार जेल वाली फीलिंग आई तो टेढ़े-मेढ़े होने लगे। जल्द ही जेल अधिकारियों ने उन्हें समझाया कि वह रामपुर नहीं, सीतापुर जेल में हैं। अब मंत्री नहीं, अपराध के आरोपित कैदी हैं। प्रदेश में अब अखिलेश यादव नहीं, योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं। आजम को यह जल्द समझ में आ भी गया और उन्होंने खुद को किसी हद तक काबू किया। उन्होंने घोषणा कर दी कि अब वह मौन व्रत रखेंगे। बहरहाल उनसे यह व्रत नहीं रखा गया।

अगले दिन जब उन्हें कोर्ट में पेशी के लिए सीतापुर से रामपुर ले जाया जा रहा था तो मीडिया के माइक-कैमरे देखकर चिल्लाने लगे कि मेरे साथ टेररिस्ट जैसा बर्ताव किया जा रहा है। उनकी प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं। अभी शुरुआत है। धीरे-धीरे आजम को जेल की आदत पड़ जाएगी, क्योंकि अभी काफी दिन अंदर रहना है। रामपुर पुलिस के कुछ दब्बू और हमदर्द अधिकारियों की मेहरबानी से उन्हें कुछ केसों में बेशक जमानत मिल गई, पर केसों की फेहरिश्त काफी लंबी है। उन्हें न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए। यह तो वह भी मान गए होंगे कि वहां देर है, अंधेर नहीं।

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