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मुसीबत बनता इंटरनेट मीडिया: दुनिया भर में मनमानी कर रहीं बेलगाम इंटरनेट मीडिया कंपनियों पर लगाम लगाना समय की मांग

कृषि कानून विरोधी आंदोलन के नाम पर देश की राजधानी में गणतंत्र दिवस पर जो उत्पात मचाया गया, उसे भूला नहीं जाना चाहिए। इस तथाकथित किसान आंदोलन के दौरान हुई व्यापक हिंसा ने यही साबित किया कि इसे कुछ देश विरोधी ताकतों का भी समर्थन हासिल है। इसकी पुष्टि तब हुई जब किसानों के समर्थन में पॉप गायिका रिहाना और स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भी ट्वीट किए। ग्रेटा ने अपने ट्वीट के साथ जो टूलकिट शेयर की, उसने इसका भंडाफोड़ कर दिया कि इस आंदोलन को विदेश में बैठे खालिस्तानी न केवल हवा दे रहे हैं, बल्कि भारत को बदनाम करने का अभियान भी चला रहे हैं

टूलकिट खालिस्तानियों के इशारे पर तैयार की गई

यह टूलकिट खालिस्तानियों के इशारे पर तैयार की गई। इसे तैयार करने में जिन लोगों ने मदद की, उनमें बेंगलुरु की दिशा रवि, मुंबई की निकिता जैकब और पुणे के शांतनु मुलुक का नाम आया। इनमें दिशा की गिरफ्तारी हो गई है। यह आश्चर्य की बात है कि कनाडा में बैठे खालिस्तानियों ने दिशा, निकिता और शांतनु को अपने साथ कैसे मिला लिया और उन्होंने भी उनका साथ देना क्यों स्वीकार किया? खुद को पर्यावरण कार्यकर्ता बताने वाले ये तीनों पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन की आड़ में सक्रिय कनाडा के खालिस्तानियों की मदद को तैयार थे, इसका पता इससे चलता है कि इन्होंने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये उनसे बात भी की। दिशा की ग्रेटा से बातचीत का विवरण बताता है कि उसे अहसास था कि वह किसी गलत काम में लिप्त है। इसीलिए उसने ग्रेटा से टूलकिट हटाने को कहा।

किसानों को भड़काने, मोदी सरकार को नीचा दिखाने के लिए इंटरनेट मीडिया का हुआ बेजा इस्तेमाल 

टूलकिट मामले की छानबीन कर रही दिल्ली पुलिस की अब तक की जांच से यह स्पष्ट है कि पंजाब के किसानों को भड़काने, मोदी सरकार को नीचा दिखाने और भारत को बदनाम करने के लिए इंटरनेट मीडिया का जमकर बेजा इस्तेमाल किया गया। यह किसी से छिपा भी नहीं कि ट्विटर, फेसबुक, वाट्सएप आदि के जरिये कृषि कानून विरोधी आंदोलन को किस तरह भड़काया जा रहा है। गणतंत्र दिवस की घटना के बाद बदनाम हुआ यह आंदोलन लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है, लेकिन उसकी अगुआई करने वाले अपनी यह जिद छोड़ने को तैयार नहीं कि तीन नए कृषि कानूनों को रद किया जाए और एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर कानून बने। इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे पंजाब के किसान पराली जलाने पर कार्रवाई के प्रविधान वाले कानून के भी विरोध में हैं।

ग्रेटा थनबर्ग या फिर दिशा, निकिता, शांतनु कैसे पर्यावरण हितैषी हैं जो पराली जलाने की छूट चाहते हैं

आखिर ग्रेटा थनबर्ग या फिर दिशा, निकिता और शांतनु कैसे पर्यावरण हितैषी हैं कि यह चाहते हैं कि किसानों को पराली जलाने की छूट मिले? पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में किसानों की ओर से पराली जलाया जाना भारत के पर्यावरण के लिए एक बड़ी समस्या बना हुआ है। ग्रेटा, दिशा, निकिता, शांतनु को तो पराली जलाने के विरोध में आंदोलन खड़ा करना चाहिए था। उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? क्या इसलिए, क्योंकि ये पर्यावरण की चिंता करने वाले नहीं, बल्कि वैसे आंदोलनजीवी हैं, जिनका जिक्र प्रधानमंत्री ने संसद में किया था। आंदोलनजीवी सदैव आंदोलनों की ताक में रहते हैं और यदि वह सरकार के खिलाफ हो रहा होता है तो उसमें कूद पड़ते हैं। मोदी सरकार के खिलाफ ऐसे कई आंदोलन चलाए गए हैं, जिनमें आंदोलनजीवियों की खासी भूमिका रही।

आंदोलनजीवी तत्व इंटरनेट मीडिया का बेजा इस्तेमाल करके झूठी खबरों, अफवाहों का लेते हैं सहारा

दूसरों के आंदोलन के सहारे अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले आंदोलनजीवी तत्व इंटरनेट मीडिया का बेजा इस्तेमाल करने के साथ झूठी खबरों और अफवाहों का भी सहारा लेते हैं। देश में ऐसे कई गैर सरकारी संगठन हैं, जो पर्यावरण या मानवाधिकार की आड़ में भारत को नुकसान पहुंचाने या फिर उसकी छवि खराब करने वाले आंदोलन चलाते रहते हैं। कई बार इनके पीछे उन अंतरराष्ट्रीय संगठनों का भी हाथ होता है, जो भारत की प्रगति से चिढ़ते हैं। इन सबकी एक बड़ी ताकत है इंटरनेट मीडिया। यह मीडिया किस कदर बेलगाम हो गया है, इसका प्रमाण है सुप्रीम कोर्ट की ओर से ट्विटर और फेसबुक को उनकी मनमानी के खिलाफ नोटिस जारी किया जाना और उन्हें फटकार लगाना।

बेलगाम होती जा रहीं इंटरनेट मीडिया कंपनियों पर लगाम लगाना समय की मांग

यह अच्छा है कि भारत सरकार इंटरनेट मीडिया कंपनियों पर लगाम लगाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह समय की मांग भी है, क्योंकि ये कंपनियां बेलगाम होती जा रही हैं। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में दुनिया भर में मनमानी करने में लगी हुई हैं। भारत सरकार जहां इंटरनेट मीडिया यूजर्स के अधिकारों को मजबूत करने जा रही है, वहीं ऐसे उपाय भी करने जा रही है, जिससे किसी भड़काऊ सामग्री को जल्द हटाया जा सके। ऐसे उपाय शीघ्र किए जाने चाहिए और वे कारगर भी होने चाहिए, क्योंकि इंटरनेट मीडिया कंपनियां मुसीबत बनती जा रही हैं। ये कंपनियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में बैर भाव बढ़ाने, लोगों को गुमराह करने और हिंसा भड़काने वाले तत्वों को भी संरक्षण देने की नीति पर चल रही हैं। कई बार तो वे अतिवादी और आतंकी तत्वों को भी प्रश्रय देती हैं। उनकी इस नीति से आज पूरी दुनिया तंग है।

इंटरनेट मीडिया फर्जी खबरों का सबसे बड़ा स्नोत और गढ़ बन गया

इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि इंटरनेट मीडिया फर्जी खबरों का सबसे बड़ा स्नोत और गढ़ बन गया है। उसके कारण न केवल सार्वजनिक विमर्श दूषित हो रहा है, बल्कि ध्रुवीकरण भी बढ़ रहा है। वास्तव में अब इनसे लाभ कम, हानि ज्यादा हो रही है। यदि इन कंपनियों पर लगाम नहीं लगी तो सरकारों के लिए शासन चलाना और खासकर कानून-व्यवस्था कायम रखना एवं समाज में सद्भाव बनाए रखना मुश्किल होगा। इंटरनेट मीडिया कंपनियां कभी तो अतिवादी तत्वों को अपने स्तर पर ही प्रतिबंधित कर देती हैं और कभी यह कहने लगती हैं कि वे ऐसा नहीं कर सकतीं, क्योंकि उनका काम तो लोगों को अपनी बात कहने की सुविधा देना भर है।

ट्विटर पर पक्षपात का आरोप

ट्विटर ने अमेरिका में संसद पर हमला करने वालों के समर्थकों को तो स्वत: संज्ञान लेकर प्रतिबंधित कर दिया, लेकिन भारत में लाल किले पर हमला करने वालों के सहयोगियों-समर्थकों पर पाबंदी लगाने से इन्कार कर दिया। जब भारत सरकार ने उसे ऐसा करने को कहा तो उसने आनाकानी का परिचय दिया। इससे उसके पक्षपाती और दुराग्रही होने का ही पता चलता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि इंटरनेट मीडिया पर लगाम लगाने में देर न की जाए। कई देश इसी दिशा में कार्यरत हैं। भारत को भी तेजी से सक्रिय होना चाहिए, क्योंकि इंटरनेट मीडिया कंपनियों की निरंकुशता किसी के भी हित में नहीं।