पिछले दरवाजे से दर्शन दे रहे नेताजी, पुराने कर्मों के लिए मांग रहे माफी

लोकप्रियता का ग्राफ भी पोस्टर फाड़कर निकलने को बेताब हैं। ऐसे में अडंग़ा लगाने वालों को बस एक मौके का इंतजार है।

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रांची। झारखंड में एक नेताजी बड़े दल में शामिल होने वाले हैं। इसे लेकर बड़े दल के कुछ नेता परेशान नजर आ रहे हैं। सोच रहे हैं इन नेताजी के आने से क्‍या खलबली मच जाए।

पिछले दरवाजे से दर्शन

राजनीति में दिन फिरते देर नहीं लगती, लेकिन दिन चुनाव में अपेक्षाकृत प्रदर्शन न करने के बाद भी फिर सकते हैं। यह कला-गुर सिर्फ बाबूलाल मरांडी को ही आती है। विश्व की सबसे बड़ी पार्टी उन्हें हाथों-हाथ लेने को बेचैन है। बेचैनी सिर्फ पार्टी में नहीं भाजपा के पदाधिकारियों में भी है। भाजपा में बाबूलाल युग फिर लौट आया है, पता नहीं बाबूलाल आ गए तो कहां जाएंगे।

वर्षों से बाबूलाल के खिलाफ आग उगल रहे, कई नेता अब पिछले दरवाजे से डिबडिह कार्यालय का रुख कर रहे हैं। दर्शन कर अपने पुराने कर्मों के लिए माफी मांग रहे हैं। चरण वंदना करने वालों में तमाम ऐसे दिग्गज भी हैं जो अपने अडिय़ल रुख के लिए जाने जाते हैं। बाबूलाल बड़े दिल वाले हैं दर्शनार्थियों को माफ भी कर देंगे, दिक्कत तो उन्हें होने वाली है जो अब तक उनकी चौखट पर नहीं पहुंचा।

मंत्री की तेजी

सूबे के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता की तेजी से उनके ही कुछ भाई-बंधु खफा हैं। कानाफूसी चल रही है कि ऐसा ही सिलसिला रहा तो सबसे आगे निकल जाएंगे बन्ना और चढ़ जाएंगे कांग्रेस आलाकमान की निगाह में। इतने रेस हैं कि कोई फटक नहीं रहा आसपास। सुपरमैन की तरह उड़-उड़ कर सब जगह पहुंच रहे हैं। किसी के भाई तो किसी के बेटा बन जाते हैं। डॉक्टरों को भगवान का अवतार बताते हैं।

लोकप्रियता का ग्राफ भी पोस्टर फाड़कर निकलने को बेताब हैं। ऐसे में अडंग़ा लगाने वालों को बस एक मौके का इंतजार है। वैसे भी टांग खिंचाई में हाथ छाप का कोई जवाब नहीं। मौका मिला नहीं कि खींच लेंगे नीचे। वो तो धनुर्धारी के साथ रहकर उम्मीद से दोगुना मिल गया वरना किस्मत का ताला खुलता ही नहीं। डॉक्टर के नाम का तमगा लेकर चलने वाले टापते रह गए।

वर्दी को खौफ

अबतक खाकी वर्दी का खौफ सिर चढ़कर बोलता था, लेकिन सरकार ने ऐसा तगड़ा एक्शन लिया कि गूंज सुनाई दे रही है प्रोजेक्ट भवन से लेकर पुलिस मुख्यालय तक। कोई इसे पहले के कारनामे का फल बता रहा तो कुछ इसे शुरुआत भी मान रहे। चर्चा यहां तक है कि अब फाइल-दर-फाइल खुलेगी तो बात दूर तलक जाएगी। वैसे हाकिम हैं बड़े भोले।

पहले कहते फिर रहे थे कि कसम से हमें तो कुछ पता ही नहीं। जब तलवार चल गई तो अब बोल रहे कि हमसे तो किसी ने पूछा ही नहीं। ऐसे ही कहने-बोलने के फेर में कुछ और नाम बाहर आ जाए तो फिर मत कहिएगा कि हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं। वैसे एक खास गुट के पुराने करीबियों में गजब की बेचैनी देखी जा रही है। कोई ऐसी चौखट नहीं है जहां माथा न टेका जा रहा हो। अब तो चौखटें भी घिसने लगी हैं।

राजनीति की चाल

मौका देखकर चौका-छक्का मारने वाले कभी कभार हिट विकेट भी हो जाते हैं। इसका ताजा उदाहरण आजसू पार्टी है। चुनाव के दरम्यान आजसू की चाल से प्रतिद्वंद्वी घबरा रहे थे, तेवर भी कमाल के थे लेकिन जब परिणाम आया तो खास परिणाम नहीं दिखा सके। सारी हेकड़ी धरी रह गई। इसके बाद ऐसा लगा कि भाजपा के साथ इनकी जुगलबंदी बढ़ेगी।

दिल्ली में एनडीए की बैठक में भागीदारी भी हुई, लेकिन सूबे में एकला चलो रे का राग अलाप रहे हैं। इस राजनीति से कुछ लोगों का कंफ्यूज होना लाजिमी है। वैसे भी कंफ्यूजन की राजनीति की कला ही केला छाप वालों को अब तक राजनीति के मैदान में टिकाए हुए है। ये सरकार के साथ भी रहते हैं और विरोध में भी। पिछली सरकार में जब तब रूठ बैठते थे। चुनाव से पहले तो ऐसा रूठे कि मोटा भाई को भी मनाने में पसीना आ गया।

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