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हबीब तनवीर की पुण्यतिथि: भाई का जीवंत अभिनय देख तनबीर का ‘हबीब’ हुआ रंगमंच

रायपुर। ख्यातिलब्ध रंगकर्मी, निर्देशक हबीब तनवीर के रंगमंच का सितारा बन जाने की किस्सागोई भी दिलचस्प है। बचपन में हबीब साहब ने अपने मुंहबोले भाई जहीर बाबू को नाटक ‘मोहब्बत के फूल’ में अभिनय करते देखा। हबीब का बालमन कुछ पल के लिए समझ ही नहीं पाया कि जो दृश्य उनके सामने है, वह हकीकत है या किसी नाटक का हिस्सा। दरअसल, जहीर बाबू नाटक में महिला पात्र की भूमिका निभा रहे थे। जिसमें प्रेमी के घायल होने के बाद वह फूट-फूट कर रोते दिखे। इधर, हबीब तनबीर भी दर्शक दीर्घा में रोने लगे। यही वह पल था, जिसने हबीब तनबीर को भी मंचों पर खींच लेने की बुनियाद रख दी।

हबीब तनवीर ने रायपुर के लारी स्कूल से शुरू किया था रंगमंच का सफर

हबीब की पुण्यतिथि पर ये किस्सा खुद हबीब तनवीर की बेटी नगीन तनवीर सुनाते हुए कहती हैं कि भाई के अभिनय देखते-देखते वह खुद भी अभिनय में हाथ आजमाने लगे। रायपुर में पले-बढ़े हबीब का बचपन बैजनाथपारा में गुजरा। लॉरी स्कूल (अब सप्रेशाला) में प्रारंभिक शिक्षा हुई। रायपुर से दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद वे नागपुर में भी पढ़े और सिविल सेवा में जाने का सपना लेकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय भी गए। लेकिन तकदीर ने उनके लिए कुछ और ही लिख रखा था। रंगमंच को ऊंचाई पर पहुंचाने वाले हबीब लंबी बीमारी से जूझते हुए आठ जून 2009 में भोपाल में 85 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए।

पढ़ाई अधूरी छोड़कर अभिनय के लिए मुंबई चले गए

बता दें कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी से उर्दू में एमए करने गए हबीब पढ़ाई अधूरी छोड़कर मुंबई चले गए। वहां कुछ फिल्मों में छोटे- मोटे किरदार निभाए, लेकिन कोई बड़ा किरदार न मिलने पर वे रायपुर वापस आ गए। इसके बाद रूसी दूतावास में कुछ काम मिलने पर वे दिल्ली चले गए और यहीं से दोबारा रंगमंच की ओर मुड़ गए। 1950 में बाद मोनिका मिश्रा से शादी के बाद एक पत्रकार के तौर पर ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया। हबीब ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। उनकी आखिरी फिल्म थी सुभाष घई की ब्लैक एंड व्हाइट थी।

सौ से ज्यादा नाटकों में निभाया किरदार

 तनवीर के मशहूर नाटकों में आगरा बाजार और चरणदास चोर प्रमुख हैं। 50 वर्ष की अपनी लंबी रंगमंचीय यात्रा में उन्होंने 100 से अधिक नाटकों को अपनी अदाकारी से जिंदा किया। लाला शोहरत राय, शतरंज के मोहरे, गांव का नाम ससुराल मोर नाम दामाद, मिट्टी की गाड़ी, पोंगा पंडित, जहरीली हवा, द ब्रोकन ब्रिज और राज रक्त उनके मशहूरों नाटकों में शुमार हैं। उन्होंने नाटक के साथ कई फिल्मों में भी काम किया। इसमें ये वो मंजिल तो नहीं, चरणदास चोर, प्रहार, ब्लैक एंड व्हाइट और राही आदि शामिल हैं।

पिता पेशावर तो मां थी रायपुर कीं

 हबीब तनवीर का जन्म एक सितंबर 1923 को रायपुर में हुआ। हबीब का पूरा नाम हबीब अहमद खान था। इनके पिता पेशावर से थे और मां रायपुर की। राजधानी के मशहूर रंगकर्मी और निर्देशक जलील रिज्वी के अनुसार तनवीर लॉरी स्कूल के छात्र थे। स्कूल में पेश किए गए नाटकों को कई बार देखने का मौका मिला। बाद में उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कीं, और अपने नाम में ‘तनवीर’ तखल्लुस जोड़ लिया।

एक समय में करते थे कई काम 

रायपुर के कलाकार राजेश गनौदवाले बताते हैं कि उनके लिखे एक नाटक ‘किस्सा ठलहा राम का’ का निर्देशन हबीब तनवीर कर चुके हैं। वह ऐसी शख्सियत थे जो एक समय में तीन काम करते थे। उर्दू में नाटक लिखते थे। नाटक का जब वे रिहर्सल कराते थे तो जोर—जोर से बोलते थे। इस दौरान नाटक के पात्र उसे दोहराते थे। वहीं एक शख्स डायलॉग को हिंदी में लिखता था। इस प्रकार से नाटक का रियाज होने के साथ ही उसका अनुवाद भी हो जाता था।

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